अच्छी फसल और बम्पर पैदावार के लिए ऐसे बढ़ाएं मिट्टी की उर्वरक क्षमता

किसान भाई अपने खेतों में जब भी किसी फसल की बुआई करते हैं तो उनकी बुआई करने से पहले खेतों की अच्छी तरह जुताई करके खेतों में तरह-तरह के जैविक, रासायनिक तथा देशी खाद अंतिम जुताई के समय इस उद्देश्य से डालते हैं की पैदावार अधिक मिले.

परन्तु जब फसल की कटाई करने के बाद उनकी मड़ाई की जाती है तो देखा जाता है की तमाम पोषक तत्वों का इस्तेमाल करने के बाद भी उतना उत्पादन नहीं मिल पाता है जीतनी किसान को उम्मीद होती है. साथ ही यह देखने को मिलता है की जब अगली फसल बोई जाती है तो, फसल शुरुआत से ही काफी कमजोर होती है. और बाद में पता चलता है की खेत के मिट्टी की उर्वरक क्षमता भी कम हो जाती है.

मिट्टी की उर्वरक क्षमता

मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ाने के तरीके

अच्छी फसल और बम्पर पैदावार के लिए किसान भाइयों को निचे दिए गए कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को अपनाना चाहिए.

हरी खाद का उपयोग

खेतों की मिट्टी की उर्वरक क्षमता को लम्बे समय तक बनाये रखने के लिए किसान भाइयों को चाहिए की हरी खाद के लिए जून के महीने में बारिश शुरू होने से पहले सनेइ या ढैंचा की बुआई करें. और जब पौधे लगभग 3 फिट के हो जाएँ तब इन्हें खेत में ही मिट्टी पलटने वाले हल से या रोटावेटर से मिट्टी में मिला देना चाहिए. ऐसा करने से मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ती है.

बचे हुए फसल अवशेष का उपयोग

किसान भाई मक्का, उर्द, मुंग, धान इत्यादि फसलों की बुआई करते हैं. और फसल की कटाई भी करते हैं लेकिन इनके बचे हुए अवशेषों को खेत से बाहर निकालकर या तो फेंक देते हैं या तो उन्हें खेत में ही जला दिया करते हैं. ऐसा करने से किसान भाइयों को कोई फायदा तो नहीं होता है. लेकिन नुकसान बहुत अधिक होता है.

अतः किसान भाइयों को चाहिए की बचे हुए फसल अवशेषों को न फेंके और न ही जलाएं, बल्कि हो सके तो इन्हें खेत में ही जला दें. या खेत में ही किसी फालतू जगह एक मीडियम छोटा गड्ढा खोदकर उसमें इन फसल अवशेषों को डालकर पानी भर दें. और ऊपर से गोबर की खाद से ढक दें. ऐसा करने से सभी अवशेष सड़कर खाद बन जायेंगे जिन्हें किसान अपने खेतों में प्रयोग कर सकते हैं.

संतुलित पोषक तत्व का करें प्रयोग

मिट्टी की उर्वरता शक्ति को बनाए रखने के लिए देशी और जैविक खाद के अलावा किसान भाइयों को अपने खेतों की खड़ी फसलों में समय-समय पर संतुलित पोषक तत्वों को भी देते रहना चाहिए, जैसे- बोरान, कैल्शियम, जिंक, कापर, लौह, पोटाश, गंधक, फास्फोरस, नाइट्रोजन आदि.

जैविक खाद

खेतों मे जैविक खाद का प्रयोग करने से मिट्टी की उर्वरक क्षमता तो बढ़ती ही है साथ ही मृदा में वायु संचार भी बढ़ता है, जिससे फसल उत्पादन भी बढ़ता है. इसे जीवांश खाद या कार्बनिक खाद के नाम से भी जाना जाता है. जैविक खाद बनाने के लिए मुर्गियों के मल-मूत्र, फसलों के उत्पाद, उद्योगों कर उत्पाद का सहारा लिया जाता है.

मिट्टी परीक्षण

बहुत से किसान भाई अपने खेतों में रासायनिक उर्वरक जैसे- फास्फोरस, पोटाश और नाइट्रोजन का प्रयोग तो करते हैं लेकिन उनको इस बात की चिंता रहती है की कहीं इन्हें खेतों में डालने से मिट्टी बंजर न हो जाए. परन्तु ऐसी कोई बात नहीं होती है.

किसान को चाहिए की इन तीनों रासायनिक उर्वरकों का संतुलित मात्रा में प्रयोग किया जाय, एक ही उर्वरक का बार-बार प्रयोग नहीं करना चाहिए. और लगभग 3 साल के अन्तराल पर मिट्टी का परिक्षण अवश्य करना चाहिए. देखा गया है की आज के समय में किसान यूरिया का उपयोग बहोत कम करते हैं.

अतः किसान भाइयों को चाहिए की नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश तीनों उर्वरक की संतुलित मात्रा को खेतों में और खड़ी फसलों में देना चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण

मिट्टी की उर्वरक क्षमता को बनाये रखने तथा अधिक पैदावार की लिए फसल को खरपतवार से रहित रखना बहोत मायने रखता है. अगर खड़ी फसल में उग आते हैं तो यह 40 से 50 प्रतिशत उर्वरकों अपने अन्दर अवशोषित करते हैं. साथ ही खरपतवार होने से खेत की नमी भी बहुत तेजी से अपने अन्दर खींचते हैं. ऐसे में खेत से खरपतवार को समय से निकाल देना चाहिए.

निकाई-गुडाई

फसल बुआई के 30 से 35 दिन बाद खेतों में फालतू के खरपतवार उग आते हैं. जो फसलों के उपज को बहोत प्रभावित करते हैं. फसलों के साथ उगे यह खरपतवार खेतों की 40 से 50 प्रतिशत उर्वरकों को अवशोषित करती हैं इस वजह से पैदावार बहुत कम मिलती है.

ऐसे में किसान भाइयों को चाहिए की यदि फसल गुड़ाई करने के लायक है तो कुदाल की सहायता फसलों के आस-पास हल्की गुड़ाई कर देनी चाहिए इससे खरपतवार नष्ट हो जाते हैं और पौधों की जड़ों में हवा का अच्छा संचार होता है जिससे उपज अधिक होती है.

इसके अलावा अगर फसल में गुड़ाई के लिए जगह न हो तो खरपतवार को खुरपी की सहायता से निकाई करके बाहर निकाल देना चाहिए.

अपनाएं फसल का चक्रिकरण

गाँव में रहने वाले काफी किसान एक ही खेत में एक ही फसल बार-बार लेते हैं. जिस कारण जितनी हानि रासायनिक उर्वरक से खेत की मिट्टी को नहीं होती है उससे कहीं अधिक हानि एक ही फसल बार-बार लेने से होती है.

इसलिए किसान भाइयों को चाहिए की अपने खेतों में हमेशा एक ही फसल न लें बल्कि फसल का चक्रिकरण करना चाहिए. इसके लिए अगर अनाज की फसलों की बुआई करते हैं. तो उसके बाद उस खेत में अगली फसल दाल वाली फसलों को उगानी चाहिए.

ऐसे करें फसल का चक्रिकरण
अनाज की फसल के बाददाल वाली फसलें
खड़ी फसल के बादबेल वाली फसल
अधिक पानी वाली फसल के बादकम पानी वाली फसल
मुसला जड़ वाली फसल के बादफैलने वाली जड़ की फसल
कम निराई-गुड़ाई करने वाली फसल के बादअधिक निराई-गुड़ाई करने वाली फसल

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