अगर खेती सचमुच घाटे का काम है? तो फिर किसान परिवारों में इतनी सम्पन्नता कैसे

क्या खेती सचमुच एक घाटे का काम है? यदि हाँ तो फिर किसान परिवारों में इतनी सम्पन्नता कैसे

भारत में कृषि उत्पादन से बहुत लोग जीवन यापन करते हैं. हमारा भारत एक कृषि प्रधान देश है. और यहाँ की आधे से ज्यादा भारतीय किसान का जीवन खेतीबाड़ी पर ही निर्भर है. फिर भी कुछ किसान खेती को घाटे का सौदा मानते हैं तो कुछ किसान खेती को एक बिजनेस के तौर पर करते हैं. भारत के इसी कृषि प्रधान देश में बहुत से किसान खेती को घाटे का सौदा बताकर मुह मोड़ लेते हैं. तो वहीँ बहुत से किसान ऐसे हैं जिनके पास बहुत कम जमीन है, और बहुत से किसान ऐसे हैं जिनके पास थोड़ी सी भी जमीन नहीं है.

फिर भी ये किसान लीच पर भूमि लेकर खेतीबाड़ी करते हैं और खेती से खुद तो पैसे कमाते ही हैं साथ ही खेतीबाड़ी में सामयिक कार्य को करने के लिए जो लेबर काम करते हैं उन्हें भी रोजगार देते हैं. अक्सर देखा जाता है की छोटे किसानों को ही खेती-किसानी में घाटे की दिक्कतें आती हैं. बड़े किसान हमेशा फायदे में रहते हैं.

छोटे किसानों के लिए खेती सचमुच घाटे का काम

अक्सर देखा जाता है की कुछ किसान खेती करके मालामाल हो जाते हैं तो कुछ किसान खेती को घाटे का काम समझकर खेती को ही छोड़ देते हैं. इसका कारण है छोटे पैमाने पर खेती करना. अधिकांश गाँव में रहने वाले किसान ही खेती को बेकार समझते हैं. इसका मुख्य वजह यह है की गाँव में किसानों के पास खेती के लिए जमीन कम होती है. और ऐसे में गाँव के किसान थोड़ी सी जमीन में कई प्रकार के फसलों की खेती करते हैं. जिससे न तो उन्हें अधिक उत्पादन मिल पाता है और न ही वे फसलों को मंडियों में बेचकर कमाई कर पाते हैं. जिससे उनको यह लगता है की खेती-किसानी घाटे का काम है.

किसान परिवारों में इतनी सम्पन्नता कैसे

जिन किसानों के पास खेती के लिए अधिक भूमि होती है. वे लगभग अपने उपयोग में आने वाली सभी फसलों की खेती कर लेते हैं जैसे- धान, गेहूं, मक्का, ज्वार, सरसों, तिल, सूरजमुखी, गन्ना, चना, मटर इत्यादि. इसके बाद वे बचे हुए खेतों में सब्जियों की खेती के साथ पशुपालन, मछलीपालन, मुर्गीपालन जैसे साइड बिजनेस करके बहुत ही अच्छी आमदनी कमाते हैं. जिससे भारत में किसानों की स्थिति विकास की ओर रहती है. और अधिकांश किसानों के परिवारों में सम्पन्नता देखने को मिलती है.

लीच पर खेती करके किसान हो रहे मालामाल

कहा जाता है की “जहाँ चाह वहाँ राह” देश में बहुत से ऐसे गरीब किसान हैं, जिनके पास बहुत कम भूमि होती है या बिलकुल नहीं होती है. ऐसे में वे किसान भाड़े पर यानि सालाना लीच पर दूसरों की जमीन लेकर खेतीबाड़ी करते हैं और अपनी मेहनत तथा लगन के बल पर अपने परिवार को गरीबी से सम्पन्नता की और ले जाते हैं.

आजकल ऐसा बहुत देखने को मिलता है की कल तक जो लोग शहर जाकर 10 से 15 हजार रुपये महीने की नौकरी करते थे, उनमे से बहुत से लोग शहर छोड़कर लीच पर भूमि लेकर सब्जियों की खेती से खुद तो मालामाल और सम्पन्न हो ही रहे हैं साथ ही खेतों में निराई, गुड़ाई, कटाई इत्यादि के लिए जो लेबर किये जाते हैं उनको भी रोजगार दे रहे हैं.

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