जैविक खाद कितने प्रकार के होते हैं

किसान भाइ अब जागरूक हो रहे हैं. पुराने जमाने में गाँव के किसान रहे हो या शहर के सभी लोग अपने खेतों में जैविक खाद का ही प्रयोग करते थे. लेकिन खेतीबाड़ी से आधिक पैदावार लेने के लिए रासायनिक खाद का अन्धाधूँध प्रयोग करते गए और जैविक कृषि धीरे-धीरे कम होती गई.

रासायनिक खाद से किसानों को पैदावार तो उम्मीद से ज्यादा मिलने लगी परन्तु भूमि की उर्वरा शक्ति धीरे-धीरे कम होती चली गई. आज के समय रासायनिक खाद के दाम भी आसमान छुए जा रहे हैं. ऐसे में अब किसान भूमि की उपजाऊ क्षमता को बनाये रखने के लिए एक बार फिर जैविक खेती की तरफ बढ़ रहे हैं और और अपने खेतों में जैविक खाद का प्रयोग तेजी से कर रहे हैं.

जैविक खाद कितने प्रकार के होते हैं

यदि किसान जैविक खेती करना चाहे तो उनके आस-पास ही तमाम तरह के जैविक खाद मिल जायेंगे. तो दोस्तों आज हम आपको जैविक खाद कितने प्रकार के होते हैं और इन्हें कैसी बनाया जाता है इसी के बारे में बताने जा रहे हैं.

गोबर की खाद

जितने भी किसान भाई हैं लगभग सभी लोग दूध पीने के लिए गाय या भैंस का पालन का करते ही होंगे. बहुत कम ही ऐसे किसान होंगे जिनके पास गाय या भैंस नहीं होंगे. तो जिन किसान भाइयों के पास ये सुविधा है इन लोगों को कहीं भी इधर-उधर भटकने की आवश्यकता नहीं है.

ये सभी किसान गाय, भैंस के गोबर को किसी गड्ढ़े में इकठ्ठा करके उसमे पानी भर दें जिससे गोबर सड़ने में सहयता मिलेगी. गोबर की खाद को अच्छी तरह से सड़ने के लिए लगभग 4 से 5 महीने लगते हैं. इस प्रकार जब यह देशी जैविक खाद तैयार हो जाये तब इन्हें खेत में फसलों की बुआई करने से पहले इस्तेमाल कर सकते हैं.

इसके अलावा जिस स्थान पर ये पशु बांधें जाते हैं वहाँ की खाद बहुत अधिक उपजाऊ होती है क्योंकि इन जगहों पर इनके गोबर के साथ मूत्र भी मिले रहते हैं और जब इन स्थनों पर खुदाई की जाती है तो बहुत बड़े-बड़े ढेले निकलते हैं ऐसे में इन ढेलों को भुरभुरी करके खेतों में उपयोग करना चाहिए.

भेंड़ या बकरियों के खाद

भेंड़ या बकरियों की खाद भी एक तरह की जैविक खाद ही है. इनके गोबर तो नहीं होते हैं लेकिन छोटे-छोटे जामुन की तरह लेड़ियाँ होती हैं जिन्हें खेतों में खाद की तरह फेंकना बहुत आसान होता है. आपके क्षेत्र में कहीं न कहीं भेंड़ या बकरी पालन करने वाले मिल ही जायेंगे. इनके यहाँ से इनके खाद को लेकर फसलों की बुआई से पहले खेतों में उपयोग करना चाहिए.

यदि आप इनके मल के साथ मूत्र को भी खेतों में डालते हैं तो यह आपके खेतों के लिए बहुत अधिक उपजाऊ होगी. इसके लिए आप इनको रात के समय अपने खेतों में बैठा सकते हैं. भेंड़ या बकरी पालन करने वालों के पास इनकी जनसंख्या लगभग 100 से भी अधिक होती है. आर इसने बड़े झुण्ड को आप जब अपने खीतों में रखवायेंगे तो पूरी रात इनके मल-मूत्र आपके खेतों में बिखेरे जाएँगे.

इस प्रकार आप अपनी खेतों के अनुसार लगभग 1 सप्ताह तक रात को रखवा सकते हैं और आपको इनके 1 रात के इनकी जनसंख्या के अनुसार 300 रूपये से लेकर 600 रुपये देने होते हैं.

मुर्गियों की खाद

मुर्गियों की खाद भी खेतों में डालकर भूमि की उर्वरता शक्ति को लम्बे समय तक बढ़ाया जाता है. मुर्गियों की खाद आपने अपने क्षेत्र में किसी भी पोल्ट्री फार्म से ले सकते हैं. रासायनिक खाद की तुलना मे ये काफी सस्ते मिलते हैं. जहां 50 kg D.A.P. आपको 1200 से लेकर 1400 रूपये में मिलेंगे वहीँ मुर्गियों की खाद आपको प्रति ट्राली 1500 से 2000 रूपये में मिल जाएँगी.

मुर्गियों की खाद को फार्म से खरीदने के बाद तुरंत खेत में नहीं डालना चाहिए. क्योंकि इसमे बहुत गर्मी होती है. और तुरंत खेत में डालने से बीजों का अंकुरण प्रभावित होता है तथा खड़ी फसल को भी काफी नुकसान होता है. इसलिए इन्हें खरीदने के बाद लगभग 1 महीने तक किसी खुले स्थान पर रख दें. ताकि इनके अन्दर से सारी गर्मी निकाल जाये, इसके बाद इन जैविक खाद का खेतों में प्रयोग करना चाहिए.

हरी खाद

हरी खाद का जैविक खाद बनाने के लिए आपको खिन भी इधर-उधर भटकने की ज़रूरत नहीं है. हरी खाद के लिए आप अपने खेतों में सनइ या ढैंचा की बुआई कर सकते हैं. सनइ या ढैंचा की हरी खाद बनाने के लिए आप जून के अंतिम सप्ताह में इनकी बुआई कर दें. इसके बाद जब इनके पौधे 3 फिट के हो जाएँ तब मिट्टी पलटने वाले हल या रोटावेटर की सहायता से जुताई करके सिंचाई कर देनी चाहिए. जिससे ये पानी में सड़कर जैविक खाद बन जायेंगे.

इसके अलावा उर्द, मुंग, मक्का, भिन्डी, गेंदा इत्यादि फसलों की तुड़ाई करने के बाद इनके बचे अवशेषों को खेत में ही रोटावेटर से जुताई करके सिंचाई कर देनी चाहिए. उसके बाद 15 किलो प्रति बीघा के हिसाब से यूरिया की छिटाई कर देनी चाहिये. खेत में नाइट्रोजन डालने से अवशेष जल्दी और अच्छी तरह से सड़ते हैं.

कम्पोस्ट

यह जैविक खाद घर के कूड़े-कचरे तथा फसलों के अवशेष जैसे- गन्ने की डंठल, आलू की पत्तियां, पुआल, वृक्ष के पौधों की पत्तियां इत्यादि अवशेषों को इकठ्ठा करके किसी छायादार स्थान पर गहरी गड्ढ़े की खुदाई करके भर दिया जाता है. उसके बाद इसमे पानी भर दिया जाता है. यह क्रिया करने के बाद ऊपर से मिट्टी की मोटी परत बिछाकर लेप लगा दिया जाता है.

4 महीने की बाद यह कचरे सड़कर जैविक खाद में परिवर्तित हो जाते हैं. इन खाद को गड्ढ़े से निकलने के लिए मिट्टी की परत को फावड़े से हटाकर 1 से 2 दिन के लिए छोड़ देना चाहिए जिससे इनमे से सारा गैस निकल जाये इसके बाद इन खाद को निकालकर खेत में उपयोग करना चाहिए.

वर्मी कम्पोस्ट

यह खाद बनाने के लिए किसान भाइयों को थोड़ा भागदौड़ करने की आवश्यकता होगी. वर्मी कम्पोस्ट खाद बनाने के लिए केचुए का इस्तेमाल किया जाता है. इसमे ये केचुए मिट्टी को खाकर मल द्वारा बाहर निकालते हैं. जो खेतों में खाद के तौर पर प्रयोग किया जाता है.

इसमे नाइट्रोजन, सल्फर तथा पोटाश की भरपूर मात्रा पाई जाती है. जिस खेत में वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग निरंतर किया जाता है उसमें खरपतवार तो कम उगते हैं हीं साथ ही पौधों में रोग बहुत कम लगते हैं. और पौधे स्वस्थ रहते हैं.

FAQ:

Q: जैविक खाद के फायदे क्या हैं?

ANS: खेतों में जैविक खाद का उपयोग करने से भूमि की उर्वरता शक्ति बढ़ती है, जलधारण की क्षमता बढती है, फसलों में रोग कम लगते हैं इत्यादि.

Q: प्राकृतिक खाद कौन सी है?

ANS: खेत में उगे प्राकृतिक खरपतवार जैसे- घास-फूंस, पेड़-पौधों की पत्तियां जो खेत में निंदाई-गुड़ाई के बाद सुखकर खेत में ही सड़कर खाद बन जाते हैं. उसे प्राकृतिक खाद कहते हैं.

Q: खाद कितने तरह की होती है?

ANS: वर्मी कम्पोस्ट, केंचुआ खाद, गोबर की खाद, बकरियों की खाद, मुर्गियों की खाद, तरल खाद इत्यादि.

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